भाजपा की बंगाल हार पर खुश होने वाले और भाजपा के समर्थक जो निराश है वो दोनो पढ़े इसे :-

by bharatheadline


बंगाल चुनाव पर #बीबीसी की रिपोर्ट

कोलकोता-बंगाल में बीजेपी को सत्ता भले न मिली हो, लेकिन वह हारी भी नहीं
जिन्हें लग रहा है कि बीजेपी की हार हुई है वे या तो बीजेपी से बहुत ज़्यादा उम्मीद कर रहे थे या फिर उसकी इस बड़ी जीत को कमतर आँक रहे है.

माटीगारा-नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के आनंदमोय बर्मन ने तृणमूल कांग्रेस के राजन सुंदास को 70 हज़ार से ज़्यादा मतों से हरा दिया. यह अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है. इस सीट से 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के शंकर मालाकार की जीत हुई थी और वह इस बार तीसरे नंबर पर रहे.
ये वही #नक्सलबाड़ी इलाक़ा है, जहाँ से 1967 में अतिवादी वामपंथी नेताओं ने हथियारबंद आंदोलन का आग़ाज़ किया और कई राज्यों के मज़दूरों, भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों और शोषितों को आकर्षित किया. नक्सलबाड़ी में बीजेपी की जीत को क्या पश्चिम बंगाल की किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र में जीत की तरह ही देखा जाना चाहिए?
नक्सलबाड़ी आंदोलन के जनक चारू मजूमदार के बेटे अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि अगर मोटे तौर पर देखें तो ऐसा ही लगता है कि देश भर में बीजेपी जीत रही है, तो नक्सलबाड़ी में भी जीत सकती है.

लेकिन अभिजीत इस जीत को एक सामान्य जीत से आगे देखते हैं. वे कहते हैं, ”इस जीत से पता चलता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों में लेफ़्ट की पकड़ बहुत कमज़ोर हो गई है और बीजेपी पाँव जमा चुकी है.”

अभिजीत कहते हैं, ”माटीगारा-नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में 30 फ़ीसदी अनुसूचित जातियों की आबादी है. बिना अनुसूचित जातियों के समर्थन के बीजेपी इस सीट को नहीं जीत सकती है.” मजूमदार आदिवासियों के बीच भी बीजेपी की पैठ की मिसाल देते हैं.
वे कहते हैं, “इसी इलाक़े में फांसीदेवा विधानसभा क्षेत्र है और यहाँ से भी बीजेपी के दुर्गा मुर्मु को लगभग 30 हज़ार के अंतर से जीत मिली है. ये अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीट है. सीपीआई (एमएल-एल) से चाय बगान की एक मज़दूर लड़की सुमंती एक्का को उतारा था लेकिन उन्हें 3000 भी वोट नहीं मिले. बीजेपी दलितों और आदिवासियों को पश्चिम बंगाल में अपने साथ लाने में कामयाब होती दिख रही है.”

इस बार के चुनावी नतीजों को देखें, तो ये बात बिल्कुल स्पष्ट नज़र आती है कि दलितों और आदिवासियों के बीच बीजेपी की मौजूदगी बढ़ रही है.

294 सदस्यों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 84 रिज़र्व सीटें हैं. इनमें से 68 अनुसूचित जाति के लिए और 16 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. इस बार टीएमसी को 45 रिज़र्व सीटों पर जीत मिली है और बीजेपी को 39 सुरक्षित सीटों पर.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों को अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है. सबसे पहली चीज़ तो यही दिखती है कि ममता बनर्जी ने बहुत ही आसानी से चुनाव जीता और बीजेपी कड़ी टक्कर नहीं दे पाई. इस बार बीजेपी का वोट शेयर 38.1 फ़ीसदी है जबकि ममता बनर्जी का 47.94 फ़ीसदी. ममता बनर्जी को 294 में से 213 और बीजेपी को 77 सीटों पर जीत मिली.

ममता बनर्जी को बीजेपी से क़रीब 10 फ़ीसदी वोट ज़्यादा मिले हैं और यह कोई छोटा फ़ासला नहीं है. बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में 40.30 फ़ीसदी वोट मिले थे. अगर लोकसभा से तुलना करें तो इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो फ़ीसदी कम वोट मिला.
ताज़ा चुनाव में बीजेपी की इस जीत से कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां साफ़ हो गईं. आज़ादी के बाद से ऐसा पहली बार हुआ है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के एक भी विधायक नहीं चुने गए. 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाम मोर्चा गठबंधन को 77 सीटों पर जीत मिली थी यानी ठीक उतनी ही सीटें जितनी इस बार बीजेपी को मिली हैं.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार नहीं बना पाई लेकिन विपक्ष की पूरी जगह उसने अपने पाले में कर ली है. पार्टियाँ अक्सर सत्ता में आने से पहले विपक्ष की जगह ही हासिल करती हैं और ये काम बीजेपी ने सीपीएम-कांग्रेस को बेदखल करके कर लिया है.
क्या विपक्ष की जगह को हासिल करना बीजेपी की कम बड़ी जीत है? इस बार का पश्चिम बंगाल चुनाव बीजेपी के सरकार नहीं बना पाने के लिए जाना जाएगा या सीपीएम-कांग्रेस के साफ़ हो जाने के लिए या फिर ममता बनर्जी के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए?जादवपुर यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन कहते हैं कि ममता का तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना अहम है लेकिन उससे ज़्यादा अहम बीजेपी का तीन से 77 तक पहुँचना है. अब्दुल मतीन मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का विपक्ष बनना यहाँ की राजनीति के लिए टर्निंग पॉइंट है. प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''बीजेपी ने जिस तरह से बंगाल में माहौल बनाया था, उसे देखते हुए यह नतीजा थोड़ी राहत देता है. लेकिन मैं नहीं मानता कि ये धर्मनिरेपक्षता की राजनीति की जीत है. ममता इसलिए जीत गईं क्योंकि मुसलमानों ने एकजुट होकर टीएमसी को वोट दिया. यह पॉलिटिकल बाइनरी की जीत है. मतलब ममता ने मुसलमानों के बीच संदेश फैलाने में सफलता हासिल की कि वोट टीएमसी को करो नहीं तो बीजेपी जीत जाएगी. ध्रुवीकरण की राजनीति की जीत को हम बीजेपी की हार नहीं मान सकते.''

इस बार का चुनाव पूरी तरह से दो ध्रुवीय रहा. 292 में से 290 सीटों पर टीएमसी या फिर बीजेपी को जीत मिली है. एक पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट और एक पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली है.

प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ”बंगाल में जिस मुर्शिदाबाद और मालदा इलाक़े में सबसे ज़्यादा मुसलमान हैं, वहाँ टीएमसी के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा उम्मीदवार जीते हैं. मतलब बंगाल के 28 फ़ीसदी मुसलमानों ने एकजुट होकर ममता को वोट किया है. लेकिन हिन्दू वोट उस तरह से ध्रुवीकृत नहीं हो पाए और ममता को इसीलिए जीत मिली. लेकिन एक समुदाय का वोट इस तरह से एकजुट होगा तो बहुसंख्यकों के बीच क्या इस पोलराइज़ेशन को लेकर कोई संदेश नहीं जाएगा? अगर काउंटर पोलराइज़ेशन हिन्दुओं के बीच भी हुआ तब क्या होगा? और याद रखिए ध्रुवीकरण की पॉलिटिक्स में इसकी आशंका हमेशा रहती है.”
प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं कि बंगाल में बीजेपी के स्थानीय हिन्दुत्व और राष्ट्रीय हिन्दुत्व में तालमेल की थोड़ी कमी थी लेकिन इसके बावजूद विधानसभा में हिन्दुत्व ने मज़बूती से दस्तक दे दी है और यह बीजेपी की बड़ी जीत है.

मतीन कहते हैं, ”सीपीएम और कांग्रेस का साफ़ हो जाना बीजेपी की सबसे बड़ी सफलता है. मुझे लगता है कि यह सफलता ममता के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से कम बड़ी नहीं है.”
हालाँकि इस बार मुसलमानों के ध्रुवीकरण का फ़ायदा भले टीएमसी को मिला लेकिन इससे विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ा बल्कि 2016 की तुलना में कम हुआ है. 2016 में पश्चिम बंगाल में कुल 59 मुस्लिम विधायक चुने गए थे लेकिन इस बार यह संख्या 44 रह गई है. कांग्रेस और सीपीएम के साफ़ होने का असर मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर पड़ा है.

2016 में कुल 59 मुस्लिम विधायकों में 32 तृणमूल कांग्रेस, 18 कांग्रेस और 9 वाम मोर्चे से थे. इस बार कुल 44 मुसलमान चुनकर आए हैं और जिनमें से 43 टीएमसी के हैं और एक अब्बास सिद्दीक़ी के आईएसएफ़ से. मुस्लिम वोटों के टीएमसी के पक्ष में ध्रुवीकरण की क़ीमत सीपीएम और कांग्रेस को भी चुकानी पड़ी.

जब पश्चिम बंगाल में मतदान हो रहा था तभी अप्रैल के दूसरे हफ़्ते में क्लबहाउस ऑडियो ऐप पर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पत्रकारों से बातचीत की चैट लीक हुई. इस लीक चैट में प्रशांत किशोर कह रहे थे कि बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफ़ी लोकप्रिय हैं और दलित खुलकर बीजेपी के साथ हैं.

प्रशांत किशोर की संस्था आईपैक यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी में काम करने वाले एक प्रोफ़ेशनल से पूछा कि मतदान के बीच इस तरह की चैट क्यों लीक हुई थी? उस प्रोफ़ेशनल ने नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, ”ऐसा प्रशांत किशोर ने जानबूझकर किया था. मुसलमानों के बीच यह संदेश देना था कि टीएमसी के पक्ष में एकजुट नहीं हुए तो बीजेपी प्रदेश में सरकार बना लेगी. यह रणनीति कामयाब रही और मुस्लिम वोट टीएमसी के साथ एकजुट हो गया.”

हिमाद्री चटर्जी कहते हैं कि बीजेपी ने जो पश्चिम बंगाल में इन्वेस्टमेंट किया और उससे जो इम्प्रेशन बनाया, उसका मेल चुनावी नतीजे से बिल्कुल नहीं है और इसीलिए बीजेपी विरोधी ख़ुश हैं. प्रोफ़ेसर हिमाद्री कहते हैं कि बीजेपी के तीन से 77 तक पहुँचने को जो लोग कमतर आँक रहे हैं वे ग़लती कर रहे हैं क्योंकि बंगाल में बीजेपी अब केवल इंटरनेट पर नहीं है बल्कि लोकसभा के बाद विधानसभा में भी पहुँच गई है.

हावड़ा में बाली विधानसभा सीट से सीपीएम की उम्मीदवार और जेएनयू में पीएचडी की स्टूडेंट दीपसीता धर तीसरे नंबर पर रहीं. यहां से टीएमसी के राणा चटर्जी को जीत मिली. दीपसीता कहती हैं कि अगर सीपीएम यहां मैदान में नहीं होती तो बीजेपी की वैशाली डालमिया जीत जातीं और यह केवल बाली सीट की बात नहीं है. दीपसीता को लगता है कि बीजेपी को बंगाल में इस बार सत्ता में आने से केवल टीएमसी ने नहीं बल्कि सीपीएम और कांग्रेस गठबंधन ने भी रोका है.

सीपीएम के साफ़ होने की वजह क्या रही? दीपसीता कहती हैं, ”यह चुनाव बिल्कुल बाइपोलर था. हम लोग भी एंटी बीजेपी एजेंडे पर लड़ रहे थे और टीएमसी भी. एंटी बीजेपी खेमे वाले मतदाताओं को लगा कि टीएमसी के पीछे जाना चाहिए क्योंकि वही बीजेपी को मात दे सकती है. ऐसा ही हुआ. मुसलमान पूरी तरह से एकजुट हो गए. उनके मन में डर था कि बीजेपी आ जाएगी और बीजेपी को टीएमसी ही रोक सकती है.”

दीपसीता कहती हैं, ”हमारे लिए बंगाल में विचित्र स्थिति हो गई है. जब हम बीजेपी का विरोध करते तो लोगों को लगता है कि टीएमसी का समर्थन कर रहे हैं. जब हम टीएमसी का विरोध करते हैं तो लोगों को लगता है कि यह बीजेपी के पक्ष में जा रहा है. हमें ये डिसाइड करने में बहुत परेशानी हुई कि किस आक्रामक एजेंडे के साथ आगे बढ़ना है. इस चुनाव में यही हुआ.”

दीपसीता ये भी मानती हैं कि जिस तरह से टीएमसी के पास ममता बनर्जी हैं और बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी वैसा कोई पॉपुलर अपील वाला नेता वामपंथियों के पास नहीं है. दीपसीता कहती हैं कि आने वाले दिन सीपीएम और कांग्रेस के बहुत ही मुश्किल भरे हैं क्योंकि बीजेपी और टीएमसी से एक साथ लड़ना आसान नहीं है. दीपसीता कहती हैं कि उन्हें फिर से शून्य से शुरू करना होगा, मानो उनके लिए फिर से 1925 के साल आ गए हैं.

पश्चिम बंगाल परिवर्तन में वक़्त लेता है. आज़ादी के बाद से कांग्रेस लगभग तीन दशक तक सत्ता में रही. कांग्रेस के बाद 34 सालों तक सीपीएम सत्ता में रही और पिछले 10 सालों से तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है. बंगाल लोगों को वक़्त देता है. ममता को लेकर भी बंगाल अपनी पुरानी रवायत ही दोहरा रहा है. लेकिन बीजेपी ने भी बंगाल के दरवाज़े पर दस्तक दे दी है और कह रही है हमारा भी वक़्त आ गया है.

साभार BBC #BBCNews

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