कीमती है धान का पुआल, खलिहान में इसके ढ़ेर ये बढ़ती है किसान की शान

by bharatheadline

बिलासपुर। कई प्रांतों के लिए पुआल भले ही नासूर और परेशानी का शबब है पर सरगुजा संभाग में धान का पुआल कीमती है। यहां के ग्रामीण इलाकों में इस समय ढाई हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर पुआल बिकता है। गांव में मवेशियों को खिलाने यही एक प्रमुख चारा है। सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर तीनों जिले में करीब चार लाख हेक्टेयर में धान की बुआई होती है। एक हेक्टयर में करीब पांच ट्रैक्टर पुआल होता है। यानी बड़े किसान को धान के साथ पुआल बेचकर भी आय अर्जित करने का मौका इस सीजन में मिलता है।
कई राज्यों में भले ही फसलों के अवशेष परेशानी के कारण बने हो। इन अवशेषों के निदान के लिए तरह-तरह के उपाय ढूंढने जा रहे हैं। खासकर धान की नराई और पुआल प्रदेश के ही कई जिलों में किसानों के साथ लोगों के लिए भी परेशानी का सबब बना है। धान की कटाई के बाद छत्तीसगढ़ के ही कई ऐसे बड़े उत्पादन वाले जिलों में धान का पुआल खेत और खलिहानों से हटाना किसानों के लिए बड़ा काम हो गया है। हर साल धान का पुआल किसानों के लिए मुसीबत लेकर आता है। इन सबसे अलग उत्तरी छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में पुआल किसानों को आर्थिक आय अर्जित करने का अवसर प्रदान करता है।
यहां किसान अपने खलिहान का पुआल किसी को देना नहीं चाहते। यहां पुआल के लिए विवाद की स्थिति बनती है। अधिया, बटाई में मेरी किसी ने खेती की है तो भूमि स्वामी को भी आधा पुआल खेती करने वाले को छोड़कर जाना पड़ता है क्योंकि पुआल यहां तो हाथ बिकता ही है, छोटे किसानों के पास वर्ष भर अपने मवेशियों को चारा खिलाने उतना पुआल नहीं हो पाता जितने की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण उन्हें बड़े किसानों के खलिहानों की ओर ताकना पड़ता है।
एक दो एकड़ जिन किसानों की जमीन है वे बड़े किसानों से पुआल खरीदते हैं। पुआल की कीमत भी कोई कम नहीं है। उत्तरी छत्तीसगढ़ में ट्रैक्टर भरकर पुआल यदि कोई खरीद रहा है तो उसे ढाई हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ढ़ाई हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर पुआल बेचकर किसान की अच्छी कमाई हो जाती है। किसानों के धान कटाई का खर्च निकल जाता है, इसलिए यहां पुआल कोई परेशानी नहीं बल्कि धान के साथ- साथ आय का जरिया भी है।
खलिहान में रखा पुआल किसान की शान
सरगुजा अंचल में पुआल किसान किसान की शान का विषय भी है। जिस किसान के खेत में बड़े पैमाने पर पुआल वर्ष पर पड़ा रहता है उसे बड़ा किसान माना जाता है और जिनके पास पुआल लेने लोग खलिहान में अक्सर पहुंचते हैं और राशि देकर पुआल खरीद कर ले जाते हैं।
नराई नहीं छोड़ते खेतों में ताकि न हो नुकसान
सरगुजा क्षेत्र में पुआल कितना कीमती है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि धान कटाई के दौरान खेतों में नराई नहीं छोड़ा जाता। खेतों में बमुश्किल 4 से 5 इंच ऊंचाई तक धान की कटाई कर ली जाती है ताकि अधिक से अधिक पुआल खलिहान तक पहुंच सके। कटाई के दौरान कृषक और श्रमिकों के बीच कई बार इस बात को लेकर विवाद भी होता है। कई बार तो खेतों में धान की कटाई नीचे से न होने पर पारिश्रमिक भी काट लिया जाता है।
मवेशी बड़े चाव से खाते हैं हाइब्रिड धान का पुआल
सरगुजा संभाग में पिछले एक दशक से हाइब्रिड धान लगाने का चलन बढ़ा है और बड़े पैमाने पर किसान हाइब्रिड धान की खेती करते हैं। किसानों के मुताबिक हाइब्रिड धान का पुआल काफी मिठास लिए होता है, इस कारण किसान मवेशी को खिलाते हैं। मवेशी भी काफी चाव से हाइब्रिड धान के पुआल को खाते हैं, इसके पीछे किसानों की बात माने तो हाइब्रिड धान तब खेतों से काट लिया जाता है जब उसके पौधों में हरा पन बना रहता है । जबकि पारंपरिक सुगंधित किस्म के धान तब तक नहीं काटे जाते जब तक पूरा पौधा सूख न जाए। अधिक सूखने से सुगंधित धान का पुआल काफी कड़ा हो जाता है। इस कारण मवेशियों से चबा नहीं पाते।
अब तो हरे चारे का साथी बन गया पुआल
कई किसानों ने तो पुआल से अधिक कीमत निकालना शुरू कर दिया है। चारा कटाई मशीन में हरे चारे के साथ पुआल की कटाई कर मिक्स चारा बना शहर में दस रुपये किलो बेचने का काम कर रहे हैं। जिले में अधिक किसानों ने तो इसे शुरू नहीं किया है पर सूखा और हरा चारा मिलाकर उसे काटकर बेचने का एक नया काम शुरू कर लिया है। इससे अब अच्छी कमाई भी होने की उम्मीद है। हरे चारे के साथ पुआल को काटकर जो चारा तैयार होता है उसे दुधारू पशुओं को भी दिया जा रहा है। सरगुजा क्षेत्र में गेहूं भूसे की किल्लत लगभग पांच- छह महीने रहती है। ऐसे में हरे चारे के साथ पुआल मिक्स कर तैयार चारा कुछ दिनों के लिए सहारा बन जाता है।
गौठानों में किसान कर रहे हैं पुआल दान
सरगुजा जिले के किसानों ने अब पुआल दान भी शुरू किया है। बड़े किसानों से जिला प्रशासन पुआल दान का आग्रह कर रहा है। जिले के गौठानों में मवेशियों के लिए पुआल की मांग की जा रही है। कुछ किसानों ने पुआल दान की शुरुआत कर दी है। शहर से लगे लाल माटी गांव के किसान त्रिलोकी सिंह ने अपने गांव के गौठान के लिए बड़े पैमाने पर पुआल दान किया है। इनकी देखा देखी अन्य बड़े किसान भी पुआल दान करने लगे हैं।
सहेज कर रखते हैं पुआल, पैरावट आकर्षण का केंद्र
सरगुजा संभाग के गांव की पहचान पैरावट होते हैं। लकड़ी के बड़े-बड़े खंभों के साथ बनाए गए मचान में पुआल रखा जाता है। वर्ष भर इसी पैरावट से पुआल निकालकर पशुओं को खिलाया जाता है। कुछ किसानों ने तो अपनी बाड़ी में दर्जनों पैरावट बना कर रखे हैं। यह पैरावट शहर से जाने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी होते हैं। जिस तरह सहेज कर पैरावट में पुआल रखा जाता है इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां के लोगों के लिए पुआल कितना महत्वपूर्ण है।
कड़ाके की ठंड में पुआल बिछाकर सोते हैं ग्रामीण
सरगुजा के दूरस्थ इलाके में कड़ाके की ठंड के दौरान वनवासियों को पुआल की गर्मी ही राहत देती है। पूरे परिवार के साथ वनवासी ग्रामीण ठंड से बचने पुआल में सोते हैं। ऐसी तस्वीरें मैनपाट, सामरी पाठ के साथ कई दूरस्थ इलाकों से अक्सर आती रहती हैं।
क्या कहते हैं किसान
सरगुजा जिले के प्रगतिशील किसान ताराचंद गुप्ता ने बताया कि सरगुजा में शुरू से पशुओं के चारे के लिए पुआल ही सहारा रहा है। पहले धान का उत्पादन भी कम होता था और पुआल भी कम होता था किंतु हाइब्रिड किस्म के धान से पुआल भी बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। मैं तो हर साल गांव के छोटे किसानों को पुआल दे देता हूं ताकि उनके मवेशियों के काम आए। खैरबार के किसान इंदर साय ने बताया कि हर साल मैं धान की खेती करता हूं और धान मिसाई के दौरान खलिहान से ही हाथों हाथ लगभग 10 ट्रेक्टर पुआल भी बिक्री कर देता हूं। खलिहान में खराब होने से अच्छा है कि पुआल से कुछ आय अर्जित हो जाए।

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