ये है रुद्र शिव की प्रतिमा, जिसमें पूरे ब्रम्हांड के होते हैं दर्शन

by bharatheadline

भोलेनाथ,रुद्र शिव,महाकाल। जितने नाम से पुकारिए इन नामों में शिवजी का ही स्वरूप मन में नजर आता है। रुद्र शिव की विशाल और अखंड ब्रम्हांड समाहित प्रतिमा का दर्शन करना है तो आपको बिलासपुर से 26 किलोमीटर की दूरी पर मनियारी नदी के तट पर जाना होगा। ताला गांव में विराजित प्रतिमा वास्तू और मूर्तिकला के बेजोड़ नमूना को प्रदर्शित करती नजर आती है। देवरानी-जेठानी मंदिर के नाम से इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाने वाली इस मंदिर का इतिहास भी कम रोचक नहीं है।
महागौरी के पूर्णांक अक्षर नौग्रह पर आधारित इस मंदिर का निर्माण किया गया है। पुरातत्तविदों और इतिहासकारों की मानें तो पांचवीं व छठवीं शताब्दी मंे मंदिर तंत्र-मंत्र साधकों का स्वर्ग रहा होगा । इस मंदिर के निर्माण के पीछे राजकीय श्रीवृद्धि का उद्देश्य भी साफतौर पर नजर आता है। इतिहासकारों का दावा है कि यह मंदिर तकरीबन 1500 वर्ष पुरानी है। वास्तुकला का इससे बेजोड़ उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलेगा।
मंदिर के सिंहद्वार या जिसे बोलचाल की भाषा में मुख्यद्वार कहा जाता है यहां पर साधु संतों से लेकर इंद्र की दिव्य सुंदरी अप्सराओं,कल-कल छल-दल बहती नदियों,पुराणों में नामित देवियों के अलावा शिव व पार्वती के अलग-अलग कथानकांे को पत्थरों में नक्काशी के जरिए उकेरा गया है। साढ़े नौ फिट की विशाल रुद्र-शिव की प्रतिमा निर्माण के पीछे तांत्रिक रहस्य भी छिपा हुआ है। सिर से लेकर पैर तक जीव जंतुओं का श्रृंगार किया गया है। शरीर के अलग-अलग अंगों को जीव जंतुओं की प्रतिमा के साथ उकेरा गया है। शिव की प्रतिमा के सिर के ऊपर दो शेषनागों को पगड़ी के रूप में दिखाया गया है। माथे से लेकर नाक के अग्र भाग पर लगे तिलक में छिपकली बना हुआ है। यह भय व विष का कारक है। आंख की पलक मेंढ़क से बना हुआ है जो विभत्सा का प्रतीक है। आंख का गोलक मुर्गी अंडे से उकेरी गई है। दोनों कान मयूर से बना हुआ है। दो मछलियों से मूंछ बनाया गया है। ठुड्डी केकड़े से बनाया गया है। स्र्द्र के दोनों कंधों में मगरमच्छ को विराजित किया गया है। दोनों वक्षों में पुस्र्ष की मुखाकृति है। पुस्र्ष के मन की गतिमान अवस्था को दर्शाया गया है। पेट के नीचे जंघों पर महिला की मुखाकृति उसकी सामंजस्य गति को दर्शाता है। कमर के नीचे दाईं व बाईं तरफ कागराज और गस्र्ड़ की आकृति बनाई गई है। यह भी गति का प्रतीक है। दोनों घुटनों पर बाघ व उंगलियों में सर्प का श्रृंगार किया गया है।
1984 की खोदाई में मिली थी प्रतिमा
पुरातत्व विभाग ने वर्ष 1984 में मनियारी नदी के किनारे ताला गांव में खोदाई प्रारंभ की थी जो तीन साल तकचली थी। वर्ष 1987 में रुद्र-शिव की विशाल प्रतिमा के साथ ही शिव गौरी व नौग्रह की प्रतिमाएं भी निकली । वर्ष 1992 तक यहां विभाग की देखरेख में खोदाई की गई है। वर्तमान में इसे पुरातत्व स्थल के रूप में पुरातत्व विभाग द्वारा विकसित किया जा रहा है। पर्यटन केंद्र के रूप में इसकी पहचान बनी है। शिवरात्रि और अन्य विशेष अवसरांे पर यहां पूजा अर्चना भी होती है। शिव की बारात निकाली जाती है। जिसमें आसपास के ग्रामीण बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं।

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