भालू के बच्चों की अब होगी सुरक्षा, बैरिकेडिंग के साथ बनाया गया झाला

by bharatheadline

बिलासपुर। उदयपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम खरसुरा और खोन्दला के बीच खेत किनारे गड्ढे में करीब 10 दिनों से पड़े मादा भालू के दोनों बच्चों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने आखिरकार सुध ली है। शनिवार को क्षेत्र की रेंजर सपना मुखर्जी, वरिष्ठ पशु चिकित्सक डा. सीके मिश्रा और वन्य प्राणी जानकार प्रभात दुबे के साथ मौके पर पहुंचीं। इलाके के आसपास आबादी और लोगों की लगातार वहां पहुंच को देखते हुए रेंजर ने करीब 20 मीटर के दायरे में बैरिकेडिंग करने के निर्देश दिए।
साथ ही जिस स्थान पर भालू के बच्चे हैं, वहां पुआल डलवाया गया है। ऊपर से शीत का प्रकोप बच्चों पर न हो इसके लिए लकड़ी और पेड़ों के पत्ते से झाला भी तैयार कराया जा रहा है। इधर, पशु चिकित्सक की जांच में दोनों बच्चे स्वस्थ मिले हैं। अगले हफ्ते भर के भीतर दोनों बच्चे चलने फिरने के लायक हो जाएंगे। इस स्थिति में आने के बाद ही मादा भालू दोनों बच्चों को अपने साथ ले जाएगी। गौरतलब है कि खरसुरा और खोन्दला गांव के बीच में खेत किनारे एक गड्ढे में पिछले गुरुवार को मादा भालू के दोनों बच्चों को ग्रामीणों ने देखा था। अनुमान लगाया जा रहा है कि पास के करमीपतरा जंगल से बच्चों को जन्म देने के बाद मादा भालू ने दोनों को वहां लाकर छोड़ा है। मादा भालू पास के जंगल में ही बनी हुई है और रोज देर शाम को वह इलाके में पहुंचती है बच्चों को दूध पिलाती है। सूर्योदय से पहले वह फिर से वापस जंगल की ओर चली जाती है। कुछ ग्रामीणों ने उसे आते जाते भी देखा है। इस बीच दोनों बच्चों की सुरक्षा को लेकर उस वक्त सवाल उठने लगे थे, जब मोटरसाइकिल सवार दो युवक दोनों बच्चों की लेकर भाग निकले।
ग्रामीणों की पहल पर उन्हें वापस लाया जा सका। अब बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के मद्देनजर वन विभाग की टीम हरकत में आई है। शनिवार को रेंजर सपना मुखर्जी के साथ पशु चिकित्सक डाक्टर सीके मिश्रा और वन्य जीव जानकार प्रभात दुबे वहां पहुंचे। सभी ने गांव के सरपंच, सचिव और अन्य लोगों से चर्चा की और भालू के बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए वहां अनावश्यक भीड़ ना लगाने और किसी को भी वहां नहीं आने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि ऐसे में कभी भी गंभीर हादसा हो सकता है। रेंजर ने उदयपुर पुलिस को भी इसके लिए सहयोग प्रदान करने का आग्रह किया है, ताकि वहां पर अनावश्यक भीड़ न जुटे। पशु चिकित्सक डा. मिश्रा ने जांच के बाद बताया कि दोनों बच्चे स्वस्थ हैं और आंखें खुल चुकी हैं। हफ्ते भर के भीतर दोनों चलने फिरने लायक हो जाएंगे। इस स्थिति में मादा भालू उन्हें अपने पीठ पर बैठाकर जंगल की ओर ले जा सकती है। बहरहाल, वन विभाग के अधिकारियों के निर्देश के बाद वहां 20 मीटर के दायरे को घेर दिया गया है ताकि लोग वहां न पहुंच सके और ऊपर से लकड़ी और पेड़ों के पत्ते से झालानुमा संरचना भी तैयार की गई है। भालू के बच्चों के पास पुआल भी डाल दिया गया है ताकि उन्हें ठंड न लगे।
दोनों बच्चे रोज पीते हैं आधा लीटर दूध
भालू के दोनों बच्चों के पेट भरने का इंतजाम लघु वनोपज समिति रिखी के प्रबंधक गोपाल सिंह के द्वारा कराया जा रहा है। उनके द्वारा रोज आधा लीटर दूध दिया जा रहा है। इस दूध को खरसुरा गांव के मंत्री पोर्ते के द्वारा पिलाया जाता है। ग्रामीण मंत्री पोर्ते पिछले एक हफ्ते से इन बच्चों को बोतल से दूध पिला रहा है। उसने नईदुनिया को बताया कि प्रबंधक के द्वारा दूध का इंतजाम कर देने के बाद मुझे दूध पिलाने की जिम्मेदारी दी गई है और मैं रोज दिन में दो या तीन बार में उन्हें दूध पिलाता हूं, ताकि वे भूखे न रहें। उन्होंने बताया कि देर शाम से सुबह होने तक उसकी मां यानी मादा भालू भी बच्चों को दूध पिलाती है, इसलिए बच्चे अभी भी स्वस्थ हैं।
नर और मादा भालू दोनों आते हैं बच्चों के पास
खरसुरा और खोदला गांव के ग्रामीणों ने बताया कि देर शाम होने के बाद जंगल की ओर से दो भालू बच्चों के पास पहुंचते हैं। इसमें एक उसकी मां भी रहती है और एक के नर भालू होने का अनुमान लगाया जा रहा है। मादा भालू बच्चों को दूध पिलाने के बाद आस-पास दीमक की बांबी को खोजने में जुट जाती है। जिसके निशान सुबह ग्रामीणों को मिलते हैं। सुबह होने से पहले दोनों भालू वापस जंगल की ओर चले जाते हैं। इन भालुओं को वहां के ग्रामीणों ने देखा भी है।
18 साल पुरानी घटना याद कर सिहर उठता है यह परिवार
ग्राम खरसुरा के रीथा राम और दलगर राम का परिवार 18 साल पुरानी घटना को याद कर आज भी सिहर उठता है। जब भी गांव में भालू की पहुंच होती है या भालू की चर्चा होती है यह परिवार उन घटनाओं को फिर से याद करने लगता है। वर्ष 2002 के 14 और 15 नवंबर की घटना में खरसुरा के दो ग्रामीणों को खूंखार भालू ने नोच-नोच कर मार डाला था। मृतक रीथा राम के पुत्र मदन सिंह ने बताया कि 14 नवंबर की सुबह गांव का दलगर राम खोन्दला से लगे झालाघुटरा के जंगल में दवा ढूंढने गया था।
वहां झाड़ियों में छिपे एक खूंखार भालू ने उस पर हमला कर दिया और उसे मार डाला। काफी देर तक उसके नहीं लौटने पर उसकी पत्नी और पुत्र जंगल में उसकी तलाश करने गए तो भालू उसके पति के शव के पास बैठा हुआ था और उन्हें देखते हुए दोनों पर हमला कर दिया। दोनों गंभीर रूप से जख्मी हो गए, लेकिन किसी तरह वहां से बच कर निकल आए।
इस घटना के दूसरे दिन मदन सिंह के पिता रीथा राम सहित 25 ग्रामीण वापस जंगल में उसकी तलाश में गए। वहां दलगर राम की क्षत-विक्षत लाश पड़ी हुई थी। इस दौरान रीथा राम जंगल में कुछ आगे निकल गया। अचानक उस पर उसी भालू ने हमला कर दिया और उसे चीर-फाड़ डाला। दोनों की मौत के बाद कई दिनों तक उस इलाके में दहशत बनी हुई थी। आज भी इन दोनों परिवार भालू की चर्चा होने पर उस घटना को याद कर सिहर उठता है।

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